पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है, लेकिन आज यह स्तंभ खुद अपनी विश्वसनीयता को लेकर सवालों के घेरे में है। इसका एक बड़ा कारण है – पत्रकारिता के क्षेत्र में अयोग्य, अप्रमाणिक और अनुभवहीन पत्रकारों की बढ़ती संख्या।
आज रिपोर्टिंग की जगह ‘रिएक्शन’ ने ले ली है। किसी भी विषय की गहराई में जाने, तथ्यों की जांच करने और निष्पक्ष तरीके से प्रस्तुत करने की जगह अब अधिकांश रिपोर्टिंग भावनात्मक, पक्षपाती और सनसनीखेज हो गई है। यह प्रवृत्ति न केवल मीडिया की साख को नुकसान पहुँचा रही है, बल्कि आम जनता को भ्रमित भी कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया के आसान पहुँच ने पत्रकारिता को एक खुला मंच बना दिया है, जहां कोई भी व्यक्ति मोबाइल और माइक लेकर “पत्रकार” बन जाता है, भले ही उसे पेशेवर पत्रकारिता का कोई प्रशिक्षण या अनुभव न हो। ऐसे ‘स्वयंभू पत्रकार’ न तो भाषा की मर्यादा समझते हैं, न ही खबर की संवेदनशीलता।
हाल ही में कुछ रिपोर्टों में देखा गया कि बिना सत्यापन के खबरें प्रसारित की गईं, जिनसे सामाजिक सौहार्द पर प्रश्न खड़े हुए। कई बार रिपोर्टिंग का उद्देश्य जानकारी देना नहीं, बल्कि भावनाएं भड़काना बन गया है।
मीडिया की गिरती साख पर चिंता जताते हुए वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा कि, “पत्रकारिता सेवा है, व्यवसाय नहीं। यह समाज का आईना है, न कि प्रोपेगेंडा का साधन।” उनका कहना है कि अब आवश्यकता है कि पत्रकारिता में प्रशिक्षित, योग्य और नैतिक मूल्यों से युक्त पत्रकारों को ही स्थान मिले।
इसके समाधान हेतु मीडिया संस्थानों को चाहिए कि वे नियुक्ति से पहले कड़ी जांच प्रक्रिया अपनाएं, नियमित प्रशिक्षण सत्र आयोजित करें और नैतिकता आधारित पत्रकारिता को प्राथमिकता दें। अंकित श्रीवास्तव विचारक


