
*आचार्य शंकर का जीवन हमारे लिए प्रेरणा : स्वामी प्रणवचैतन्य पुरी महाराज ने कहा मुकेश शुक्ला आज तक 24 *7*
ज्योतिर्लिंग तीर्थ धाम ओकार नगरी में इन दिनों आदि शंकराचार्य जी महोत्सव पर्व पर
संतो की वाणी में सदैव ही अद्वैत की गूंज बनी रहती है : प्रो.रामनाथ झा
सभी में अनुस्युत अधिष्ठान है अद्वैत
आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग मप्र शासन द्वारा एकात्म धाम, ओंकारेश्वर में चल रहे पंच दिवसीय ‘एकात्म पर्व‘ के द्वितीय दिवस में विशिष्ट संतों की गरिमामय उपस्थिति रही। पूरे दिन विविध गतिविधियों का आयोजन किया गया जिनमें प्रणव साधना, वेदांत सत्र, आचार्य शंकर के जीवन पर वक्तव्य आदि सम्मिलित हैं।
प्रणव साधना सत्र के माध्यम से स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती के मार्गदर्शन में ध्यान कराया गया। सत्र में ध्यान से जुड़ी गूढ़ता व ध्यान विधि आदि के संदर्भ में प्रकाश डाला।
अद्वैतामृतम के ओंकार सत्र में श्री श्री माँ पूर्णप्रज्ञा ने ओंकार विषय पर वक्तव्य देते हुए जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं के अधिष्ठान ओंकार के संदर्भ में बताया। उन्होंने कहा कि क्षणिक और नाशवान विषयों का त्याग कर अविनाशी तत्व का बोध होना ही सच्चा विवेक है। सत् और असत्, आनंद और अनानंद का भेद समझना आवश्यक है, क्योंकि जो तत्व जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्था में भी विद्यमान नहीं प्रतीत होता, लेकिन वास्तव में सदैव अस्तित्वमान रहता है — वेदांत उसी का बोध कराता है।
उन्होंने यह भी कहा कि आदि शंकराचार्य ने मांडूक्य उपनिषद तथा गौड़पादाचार्य कृत मांडूक्य कारिकाओं पर टीका लिखकर इसी अद्वैत तत्व को उजागर किया। संसार में अज्ञान ही एकमात्र पाप है और वेदांत ही दूरी, देरी व दूसरापन समाप्त करने का साधन है। आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है — यही अद्वैत का परम संदेश है।
अद्वैतामृतम के दूसरे सत्र में स्वामी प्रणव चैतन्य पुरी ने आचार्य शंकर के जीवन के दिव्य वृत्तांत प्रस्तुत किए व उनकी दार्शनिक गूढ़ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया की किस प्रकार काशी में एक चाण्डाल आचार्य के समक्ष आता हैं जिसे वे हटने को कहते हैं जिस पर चाण्डाल उनसे पूछता हैं कि क्या आप चैतन्य स्वरूप को हटने की कह रहे हैं, इसके पश्चात उन्होंने मनीषा पंचकम की रचना की।
उन्होंने कहा कि आचार्य शंकर का सम्पूर्ण जीवन समस्त समाज के उत्थान के लिए समर्पित था। उनका उद्देश्य था कि हर व्यक्ति अद्वैत के अनुभव से जाग्रत हो। “विना विनायकम् अपूर्व शंकरम्” — अर्थात श्रीगणेश के बिना अपूर्व शंकर भी कार्य का शुभारंभ नहीं करते, यह उनका विनम्रता भरा दृष्टिकोण था।
उन्होंने बताया कि शिव और शक्ति के समन्वय से ही सृष्टि की रचना संभव है। इसी भाव से आचार्य शंकर ने माँ अन्नपूर्णा, माँ नर्मदा एवं अन्य शक्तियों की स्तुति की और अनेक स्तोत्रों की रचना की। उनके रचाए स्तोत्र केवल भक्ति नहीं, बल्कि दर्शन के जीवंत स्रोत हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि आठ वर्ष की अल्पायु में शंकर कालड़ी, केरल से ओंकारेश्वर आए और यहाँ समाधिस्थ गुरु गोविन्द पाद से दीक्षा प्राप्त की। यदि गुरु गोविन्द पाद न होते, तो विश्व को आचार्य शंकर न मिलते। आचार्य ने अपने गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए गुरु अष्टकम् की रचना की, जो आज भी शिष्यत्व की पराकाष्ठा का उदाहरण है।
आयोजन के दूसरे चरण में संतों की दिव्य सन्निधि में साधकों की जिज्ञासा का निवारण किया गया। इस सत्र में माँ पूर्णप्रज्ञा, स्वामिनी सद्विद्यानंद सरस्वती, स्वामी समानन्द गिरि, स्वामी वेदतत्त्वानंद पुरी, स्वामी भूमानंद सरस्वती, स्वामी शैलेंद्र सरस्वती, स्वामी योगप्रताप सरस्वती, स्वामी ऐश्वर्यानंद सरस्वती आदि संतों ने उपासना का अद्वैत दृष्टिकोण, साकार-निराकार, ब्रह्म व माया, ज्ञान-अज्ञान आदि विषयों पर स्पष्टता प्रदान की। यह सत्र एक अत्यंत रोचक व ज्ञानवर्धक सत्र रहा।
चिन्मय इंटरनेशनल फाउंडेशन से प्रोफेसर गौरी माहुलिकर ने आचार्य शंकर के तेजस्वी जीवन पर प्रकाश डाला व उनके जीवन के विविध अद्भुत प्रसंग व वृत्तांतों को प्रस्तुत किया। शंकर का जीवन एक प्रेरणा हैं, उनसे निर्भीकता, दृढ़ता आदि गुण सीखने चाहिए। आद्य शंकराचार्य की आध्यात्मिक प्रगति व प्रार्थना के फलस्वरूप ही माँ नर्मदा उनके कमंडल में समाहित हो गई।
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रामनाथ झा ने विविध संतों की वाणी में अद्वैत के भाव की अभिव्यक्ति के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि अद्वैत वेदांत का सिद्धांत सार्वभौमिक हैं व सर्वत्र व्याप्त हैं। अनेक संतों ने अपनी अपनी दृष्टि से इस विचार को प्रस्तुत किया व विश्व को मार्गदर्शित किया।
अंतिम में सुप्रसिद्ध स्तोत्र गायक जयतीर्थ मेवुंडी ने पांडुरंग अष्टकम्, अच्युताष्टकम, शिव शंभो स्वयं भो आदि रचनाओं की ऊर्जावान प्रस्तुति से श्रोताओं को आनंदित किया।
आज कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर इस्कॉन के आध्यात्मिक गुरु गौरांग दास, फिल्ममेकर प्रवीण चतुर्वेदी, इंफ्लुएंसर विशाल चौरसिया रील तो रियल: अवेकनिंग वननेस थ्रू स्टोरीटेलिंग सत्र में संवाद करेंगे। साथ ही अन्य वक्तव्य, संवाद व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे।
अद्वैत वेदांत के लोकव्यापीकरण हेतु आयोजित एकात्म पर्व में अन्य गतिविधियां जैसे अद्वैत लोक प्रदर्शनी, अद्वैत शारदा पुस्तकालय आदि आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।


