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सन्यास आश्रम में तीन दिवसीय कार्यक्रम: आदर्श परिवार और संस्कृति पर हुआ मंथन


मुकेश शुक्ला आज तक 24 * 7
ओंकारेश्वर ठीक है नगरी में
कार्यक्रम के संचालक स्वामी परमानंद सरस्वती ने जानकारी देते हुए बताया कि ओंकारेश्वर का प्रतिष्ठित सन्यास आश्रम जहां पर वैदिक कार्य एवं सेवाएं निरंतर होती हैं, वहां इस वर्ष भी गुरुजी रामानंद सरस्वती जी की पुण्यतिथि पर तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम श्राद्ध पक्ष की सप्तमी पर हर वर्ष आयोजित किया जाता है।

आश्रम की स्थापना लगभग 1960 में गुरुजी रामानंद सरस्वती जी ने अपने गुरु से प्रेरणा से की थी। इस आश्रम का मुख्य उद्देश्य भारतीय संस्कृति, वैदिक परंपरा का प्रचार-प्रसार करना एवं साधु-संन्यासियों और परिक्रमा वासियों की सेवा करना है। 2008 में गुरुजी का काशी में देहांत हुआ, तब से हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर यह विशेष आयोजन किया जाता है।

आदर्श परिवार और संस्कृति पर केंद्रित रहा आयोजन

इस वर्ष कार्यक्रम का विषय “आदर्श भाव, आदर्श परिवार” रखा गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया कि भारतीय संस्कृति में परिवार और समाज की व्यवस्था हमेशा से आदर्श रही है।

उन्होंने कहा कि—

प्राचीन काल में संयुक्त परिवार परंपरा थी, जहां एक ही छत के नीचे कई पीढ़ियां साथ रहती थीं।

वैदिक ग्रंथों में मातृ देवो भव, पितृ देवो भव जैसे आदर्श भाव बताए गए हैं।

आश्रम व्यवस्था — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास — जीवन को आदर्श बनाने का मार्गदर्शन देती है।

संस्कृति का सही ज्ञान बच्चों को देना आवश्यक है, क्योंकि हमारी परंपरा वृद्धाश्रम की नहीं, बल्कि संयुक्त परिवार की रही है।

कई साधु-संतों ने उदाहरण देते हुए बताया कि आधुनिक संसाधनों के बीच भी यदि हम अपने आदर्श ग्रंथों और परंपराओं को अपनाएं तो जीवन शुद्ध और सार्थक हो सकता है।

तीन दिवसीय कार्यक्रम का समापन आज

कार्यक्रम के पहले दो दिनों में संत-महात्माओं ने विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे। आज अंतिम दिन में बाहर से आए साधु-संत गुरुजी रामानंद सरस्वती जी के जीवन और शिक्षाओं पर अपने विचार रखेंगे। धार्मिक अनुष्ठानों और प्रवचनों के साथ कार्यक्रम का समापन होगा।

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Author: aajtak24x7

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