राजू देवड़ा बालीपुर
स्थान बालीपुर
अश्विन माह की शुक्ल पक्ष की महा नवमी पर श्रीबालीपुरधाम में यज्ञ हुआ।
सन् 1944 से यज्ञ हो रहा है आज भी वैसा ही विद्यमान है।
यज्ञ की विशेषता है कि यज्ञ की भभूति कोई भी भक्त उसे लगाता है तो उसके जीवन में परिवर्तन आ जाता है।
-मनावर :-शारदीय नवरात्र अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से श्री बालीपुरधाम गुरू गजानन जी महाराज की प्रतिमा की पुजन- अर्चन कर पुष्पो की माल्यार्पण से प्रारंभ हुई। नव दुर्गा के नौ रूपों की पूजा हुई। है इससे सुख शांति मिलती है और मां दुर्गा प्रसन्न होती है। पौराणिक कथा के अनुसार नवरात्रि की उत्पत्ति के संबंध में बताया गया है कि अहंकारी महिषासुर राक्षस से जुड़ी हुई है। महिषासुर में देवताओं को परेशान किया और शासन करने का प्रयास किया ।तब मां का जन्म हुआ। भगवान राम ने रावण को मारने के लिए पहले मां दुर्गा की पूजा की थी। श्री श्री 1008 श्री गजानन जी महाराज द्वारा भी मां की पूजा कर वरदान प्राप्त किया था। श्रीबालीपुरधाम मे बाबाजी की पहचान मां की उपासना ,संध्या जप एवं हवन से ही होती है ।
सन् 1944 से हवन होता था।
श्री गजानन जी महाराज सन् 1944 से हवन करते थे। विश्व कल्याण के लिए ।जहां-जहां हवन का धुआं जाता था,वहां-वहा कोई प्रकोप नहीं होता है ।उसी के तर्ज पर जी महाराज जी एवम भक्तों की तपस्या भी चल रही है।
सद्गुरु सेवा समिति के जगदीश चन्द्र पाटीदार ने बताया कि आज महानवमी पर हर अध्याय के बाद में पूर्णाहुति दी जाती है , उसमें लौंग, इलाइची ,केसर ,काजू ,बादाम किशमिश ,बिल्वफल ,मखाना ,मिश्री,अंजीर,मौसमी फल एवम सूखा मेवा की सामग्री हवन कुण्ड मे आहूति दी गई । उक्त सामग्री प्रत्येक अध्याय के बाद में आहुति दी जाती है। यह बालीपुर धाम की विशेषता है। उक्त कार्यक्रम श्री योगेश जी महाराज एवं सुधाकर जी महाराज की उपस्थिति में अनवरत चल रहा है। उज्जैन की महर्षि कण्व संस्कृत पाठशाला से आचार्य जितेंद्र जोशी के साथ में 42 बटुक आये है जो यहां पर दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। श्रीबालीपुरधाम के आचार्य बंटी महाराज के नेतृत्व में दुर्गा सप्तशती का पाठ हो रहा है । श्रीदुर्गा सप्तशती के 13 अध्याय का हवन कर कन्या पूजन एवं महा पूर्णाहुति हुई । विशाल पैमाने पर भंडारा हुआ ।कन्या पूजन के लाभार्थी हर्ष पाटीदार रहे। ब्राह्मण भक्तों की अपार भीड़ रही।



