लोकेशन/ सोनभद्र उत्तर प्रदेश
रिपोर्ट/ कन्हैयालाल केशरी
खनन ई-नीलामी में बड़ा खेल उजागर: हाईकोर्ट ने डीएम का आदेश रद्द किय
सबसे ऊंची बोली लगाने वालों के पक्ष में फैसला, कम बोली वाली कंपनियों को पट्टा देने पर सवाल
सोनभद्र। जनपद के चर्चित खनन पट्टा ई-नीलामी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ई-नीलामी प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और अधिक बोली लगाने वाली कंपनियों को तकनीकी आधार बताकर बाहर कर कम बोली लगाने वालों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।
जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की डिवीजन बेंच ने सोनभद्र जिलाधिकारी द्वारा जारी एलओआई (लेटर ऑफ इंटेंट) को निरस्त करते हुए प्रशासन को याचिकाकर्ता कांत कंस्ट्रक्शन कंपनी और रुद्रा एंटरप्राइजेज के पक्ष में नया एलओआई जारी करने का आदेश दिया है।
मामला 12 जनवरी 2026 को सोनभद्र में विभिन्न खनन क्षेत्रों की ई-नीलामी से जुड़ा है। कांत कंस्ट्रक्शन कंपनी ने एक खनन पट्टे के लिए 1051 रुपये प्रति घन मीटर की सर्वाधिक बोली लगाई थी, जबकि बेस प्राइस मात्र 165 रुपये प्रति घन मीटर था। इसके बावजूद कंपनी की बोली यह कहते हुए निरस्त कर दी गई कि आवश्यक हार्ड कॉपी जमा नहीं की गई। बाद में वही पट्टा मात्र 207 रुपये प्रति घन मीटर की बोली लगाने वाली मां दुर्गा माइनिंग वर्क्स को आवंटित कर दिया गया।
इसी प्रकार दो अन्य खनन पट्टों में 333-333 रुपये प्रति घन मीटर की ऊंची बोलियां खारिज कर 201 और 202 रुपये प्रति घन मीटर की बोली लगाने वाली कंपनियों को ठेका दे दिया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवव्रत मुखर्जी ने कोर्ट में दलील दी कि सभी दस्तावेज समय से ऑनलाइन अपलोड किए गए थे और हार्ड कॉपी भी जमा कर दी गई थी। 24 फरवरी को जब टेंडर बॉक्स खोला गया तो दस्तावेज गायब मिले।
हाईकोर्ट ने इसे गंभीर मानते हुए कहा कि बोलियां खोलने की तारीख 24 फरवरी थी, जबकि निरस्तीकरण सूचना 25 फरवरी को जारी हुई। इससे प्रथम दृष्टया स्पष्ट होता है कि पहले व्यावसायिक बोलियां देखी गईं और बाद में तकनीकी आधार बनाकर ऊंची बोलियों को बाहर किया गया।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दस्तावेज जमा न करने का दावा कैसे सही है। ऐसे में दस्तावेज गायब किए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के चर्चित “शांति कंस्ट्रक्शन” फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी नीलामी प्रक्रिया का उद्देश्य राज्य को अधिकतम राजस्व दिलाना होता है, न कि तकनीकी त्रुटियों के नाम पर सबसे ऊंची बोली लगाने वालों को बाहर करना।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि जहां सरकार को 1051 रुपये प्रति घन मीटर का राजस्व मिल सकता था, वहां मात्र 207 रुपये प्रति घन मीटर में पट्टा देकर सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया गया।
भूमि स्वामियों का ‘राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल’ समाप्त
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जिन भूमियों पर खनन पट्टे के लिए ई-निविदा आमंत्रित की गई थी, वहां भूमि स्वामियों को दिया गया अंतिम अवसर अब समाप्त माना जाएगा। अदालत ने कहा कि भूमि स्वामियों को एक रुपये अधिक बोली लगाकर पट्टा लेने का विकल्प दिया गया था, लेकिन उन्होंने कम दर पर पट्टा लेने से इनकार कर दिया था। ऐसे में अब उनका “राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल” समाप्त हो चुका है और इस मामले में आगे कोई दावा स्वीकार नहीं होगा।
यह फैसला सोनभद्र के खनन सिंडिकेट और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है तथा ई-नीलामी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है।



