जितेंद्र जैन जिला शिवपुरी
समाचार
शिवपुरी विधानसभा में बीमार पशुओं के पालकों को बंटनी थीं दवाएं, विभाग ने स्टाक में ही कर दीं एक्सपायर।
पशु पालन विभाग का कारनामा उजागर, लाखों की दवाएं कचरे में।
फोटो-पशुपालन विभाग के कर्ताधर्ताओं द्वारा फेंकी गई दवाएं
फोटो-पशुओ की चोट पर लगाने वाली क्रीम एक तरफ जिले में पशु पालक अपने बीमार मवेशियों के इलाज के लिए
सरकारी अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं,
दूसरी तरफ पशु पालन विभाग लाखों रुपये की सरकारी दवाओं को स्टोर में ही एक्सपायर करा रहा है।
सबसे शर्मनाक बात यह है कि एक्सपायर होने के बाद इन दवाओं को नियमों को ताक पर रखकर नोनकोलू की पुलिया पर खुले में फेंक दिया गया, जहां आवारा कुत्ते, मवेशी और छोटे बच्चे घूमते रहते हैं। सवाल उठ रहा है कि लाखों की दवाएं स्टाक में क्यों सड़ाई गईं? क्या जानबूझकर इनका वितरण नहीं किया गया ताकि पशु पालकों को निजी मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएं खरीदने पर मजबूर होना पड़े? और अब खुले में दवाएं फेंककर किस बड़े घोटाले पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है?
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क्या है पूरा मामला?
सूत्रों के अनुसार शासन से पशु पालकों को निःशुल्क वितरित करने के लिए लाखों रुपये की एंटीबायोटिक, कृमिनाशक, मिनरल मिक्सचर और टीकाकरण संबंधी दवाएं भेजी गई थीं। इन दवाओं को पशु शिविरों और पशु औषधालयों के माध्यम से बीमार पशुओं के पालकों को निःशुल्क वितरित किया जाना था। लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने इन्हें समय पर वितरित करने की बजाय सरकारी स्टाक में ही दबाए रखा। नतीजतन दवाएं एक्सपायर हो गईं। अपनी लापरवाही छिपाने के लिए विभाग ने रातों-रात इन दवाओं को बोरियों में भरकर नोनकोलू की पुलिया के पास खुले में फेंक दिया।
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डिस्पोजल के नियमों का खुला उल्लंघन
-नियमानुसार एक्सपायर दवाओं के डिस्पोजल के लिए एक समिति बनानी पड़ती है, जिसमें अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) या तहसीलदार, वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी और फार्मासिस्ट का होना अनिवार्य है। इस समिति के सामने ही दवाओं की गिनती और पंचनामा होता है। यहां कोई समिति ही नहीं बनाई गई।
-एक्सपायर दवाओं को खुले में, नदी-नाले या पुलिया पर फेंकना बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 और ड्रग्स एंड कास्मेटिक्स एक्ट 1940 के तहत गंभीर अपराध है। इससे जल, जमीन और हवा प्रदूषित होती है। इन दवाओं को खाकर आवारा पशुओं और बच्चों की जान भी जा सकती है और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस फैलता है।
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नियमानुसार क्या होना चाहिए था?
-दवा स्टोर में फर्स्ट इन फर्स्ट आउट का नियम लागू होता है। एक्सपायरी से 3 से 6 महीने पहले ही ऐसी दवाओं की सूची बनाकर उच्च अधिकारियों और जिला औषधि निरीक्षक को भेजनी चाहिए थी, ताकि उन्हें अन्य जिलों में ट्रांसफर किया जा सके या शिविरों में प्राथमिकता पर बांटा जा सके।
-एक्सपायर होने के बाद कलेक्टर द्वारा अधिकृत डिस्पोजल कमेटी बनाई जाती है। यह कमेटी स्टाक रजिस्टर से मिलान कर प्रत्येक दवा की मात्रा, बैच नंबर और कीमत का सत्यापन करती है।
खुले में फेंकने की बजाय दवाओं को मध्यप्रदेश वेस्ट मैनेजमेंट के अधिकृत कामन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में ले जाकर
1200 डिग्री तापमान वाले इन्सीनरेटर में जलाकर नष्ट किया जाना चाहिए था।
पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कर उसका रिकार्ड 5 साल तक सुरक्षित रखना अनिवार्य है,
आडिट में जवाब दिया जा सके।
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ये बोले जिम्मेदार
यह मामला आपके द्वारा मेरे संज्ञान में लाया गया है।
मैं इस संबंध में अपने स्टाफ से जानकारी लेता हूं कि जहां दवाएं मिली हैं उसके नजदीक हमारी कौन-कौन सी संस्थाएं हैं। किस-किस संस्था को दवाएं वितरित की गई हैं और कौन से बैच नंबर की दवाएं वहां फेंकी गई हैं। उस बैच नंबर की दवाएं किन संस्थाओं को वितरित की गई हैं, इसकी जानकारी लेकर जांच करवाता हूं।
डा राजीव गुप्ता,
उप संचालक, पशुपालन विभाग, शिवपुरी



