
सिरोंज। जैन समाज के श्री 1008 भगवान आदिनाथ के जन्म एंव तप कल्याणक महोत्सव के उपलक्ष्य में दिगम्बर जैन बडा मंदिर व दिगम्बर जैन पचखनी मंदिर में भगवान आदिनाथ का जन्म कल्याणक महोत्सव बडें ही धूमधाम से मनाया गया। प्रातः काल प्रभात फेरी व जैन मंदिरों में शांतिधारा,पूजन,पाठ,विधान सम्पन्न हुए। तो वही जिन शासन एकता संघ द्वारा वृद्ध आश्रम पहुचकर गरीबो को भोजन कराया।
वृद्ध आश्रम में किया गया गरीबो को भोजन वितरण – श्री 1008 भगवान आदिनाथ के जन्म एंव तप कल्याणक महोत्सव के उपलक्ष्य में जिन शासन एकता संघ के प्रमुख जितेन्द्र जैन बब्लू के नेतृत्व में लिंक रोड स्थित वृद्ध आश्रम पर जैन समाजजनो ने वृद्धो को भोजन का वितरण किया गया। इस मौके पर राजेश जैन,रामकुमार जैन,संजय जैन,अनिल जैन सिघई,विक्रांत जैन,संदीप जैन,प्रवीण जैन मौजूद रहे।
दिगम्बर जैन बडें मंदिर में आर्यिका सूक्ष्ममति माता जी निर्मला दीदी के सादिंध्य में विभिन्न कार्यक्रमो का आयोजन किया गया। इस अवसर पर निर्मला दीदी ने कहा कि इस पृथ्वी के प्रथम महापुरूष पुरूदेव आदिनाथ तीर्थकर थें। वही उन्होने कहा कि युग के आदि में एक ऐसे महापुरूष ने इस धरती पर जन्म लिया था। जब इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर भोग उपभोग की साम्रगिया समाप्त होने लगी थी। जो सभी मनुष्यो को कल्पवृक्षो से प्राप्त होती थी। कल्पवृक्ष 10 प्रकार के होते थें कल्पवृक्ष तेजांग नाम के इतना तेज उजाला प्रकाश होता है कि वहा कभी रात नही होती। जब इस पृथ्वी पर यह कल्पवृक्ष होते थे। उसे भोग भूमि कहा जाता था। जैसे-जैसे वृक्षो से वस्तुंए देने कम होने लगी तो उसी क्रम से कर्मभूमि प्रारंभ होने लगी। भोग भूमि में तो मनुष्य एक दो तीन दिन के बाद भोजन बेर,आंवला के बराबर करते थे। शरीर की लम्बाई 3 से 6 व 9 किलो मीटर होती थी। सभी मनुष्यो की धीरे-धीरे कल्पवृक्ष के नष्ट हो जाने पर उस समय की समस्त जनता दुखी हो गई। ऐसे समय में अयोध्या नगरी में तिपा नाभिराय एंव माता मरूदेवी के गर्भ में स्वर्ग से आदिनाथ वृषभदेव का अवतार हुआ। जिन महापुरूष के गर्भ में आने के माह पहले ही आकाश से प्रतिदिन सुबह दोपहर और शाम रात्रि चार वार रत्नो की वर्षा मां के आंगन नगर में होती थी। फिर गर्भ में आने के 9 माह तक जन्म होने तक हर बार साढे तीन करोड रत्नो की वर्षा सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर आकाश से करते थे। वही उन्होने कहा कि भगवान आदिनाथ का जन्म चैत्रकृष्ण नोमि को अयोध्या नगर में हुआ था।
ऐरावत हाथी पर बैठकर अयोध्या नगरी आते है भगवान इंद्र – दिगम्बर जैन बडें मंदिर में कार्यक्रम के दौरान आर्यिका सूक्ष्ममति माता जी ने कहा कि जैसे ही तीर्थंकर बालक का जन्म होता है वैसे ही स्वर्गो में देवो विमान में घंटा, सिंहनाद,शंख,नगाडे बनजे लगते है। इससे देव लोग समझ जाते है कि पृथ्वी पर तीर्थंकर प्रभु बालक का जन्म हो गया है। तब स्वर्ग में रहने वाले देव बालक को नमस्कार करते है एंव सौधर्म इन्द्र तुरन्त स्वर्ग से एक लाख योजन लम्बे वाले ऐरावत हाथी पर बैठकर जिस हाथी की अनेक सुडे व दांत होते है। उन दांतो पर सरोवर होते है तो उन पर देविया नृत्य करती है। ऐसे हाथी पर बैठकर इन्द्र आदि समस्त देव भगवान की जन्म नगरी अयोध्या आते है। हाथी आकाश में खडा रहता है और सौधर्म इन्द्र व अन्य देवी शची महल में जाकर प्रभु बालक को देखकर अत्यन्त हर्षित होती हैं। फिर वह प्रभु बालक की माता को माया मयी निद्रां में सुलाकर प्रभु बालक को अपनी गोद में उठा लेती है। इसके बाद मां के पास माया मयी बालक बना कर सुला देती है। बालक को कक्ष के बाहर खडें सौधर्म इन्द्र को दे देती है। बालक की सुन्दरता को देखने वह एक हजार नेत्र बनाते है फिर भी वृत्त नही होता। तो वही सौधर्म इन्द्र बालक को गोदी में लेकर ऐरावत हाथी पर बैठकर नृत्य गान आंनद मनाते हुए सुदर्शन मेरू पर्वत पर ले जाते है। जो पर्वत इस पृथ्वी से एक लाख योजन ऊंचा है। वहा सिंहासन पर बालक को बैठाकर क्षीर सागर के जल से 1008 कलशो से तुरन्त जन्में शिशु बालक प्रभु का अभिषेक करते है और सुदर्शन पर्वत से आकर बालक को माता-पिता को सौपकर भगवान का जन्म कल्याणक मनाकर अपने अपने स्वर्गो में चले जाते है।
पृथ्वी के प्रथम तीर्थंकर थे भगवान आदिनाथ – उन वीतराग तीर्थंकर प्रभु के जन्म को ही जन्म कल्याणक कहा जाता है। क्योकि अब उनका दूबारा जन्म नही होगा। प्रभु के जन्म के प्रभाव से तीनो लोको में आनंद और सुख का प्रसार होता है। उनके जन्म के प्रभाव से पृथ्वी सभी प्रकार के धन्य धान से परिपूर्ण हो जाती है। आदिनाथ भगवान इस पृथ्वी पर प्रथम तीर्थंकर थे उनके बाद 23 तीर्थंकर अजितनाथ,संभवनाथ, अभिनंदननाथ,सुमतिनाथ, पदमप्रभु,सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभु, पुष्पदंत, शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ,वासुपूज्य, विमलनाथ,अंनतनाथ,धर्मनाथ,शांतिनाथ,कुन्भुनाथ,अरनाथ,मल्लिनाथ,मुनि सुव्रतनाथ,नमिनाथ, 22 वे तीर्थंकर व नेमीनाथ 23 वे पार्श्वनाथ एंव 24 वे तीर्थकर महावीर स्वामी जी है। आदिनाथ भगवान के जन्म से पहले इस धरती पर जनता बहुत दुखी थी। कोई भी नही जानता था कि जीवन चलाने के लिए क्या किया जाए। एक दिन नागरिक आदि प्रभु के पिता के पास गए और बोले हम लोग भूखे मर रहे हमें कुछ बताए तब पिता नाभिराय ने कहा कि पुत्र आदि कुमार के पास जाइए वह आप लोगो के सब दुख दूर करने में समर्थ है उनके पास अवधि ज्ञान है वह सब जानता है। जैसे ही नागरिक आदि कुमार के पास पहुचे और अपने दुखो को बताया। तो आदि कुमार ने उनके दुखो को सुनकर उपाय बताया कि आप लोग अब कर्म कीजिए क्योकि अब कल्पवृक्ष नष्ट हो गए है। इसलिए जीविका को चलाने के लिए कर्म करना पडेगा। आदिकुमार ने सभी पर दया कर उपदेश दिया कि अब पट कर्म करना सीखिए।
भगवान आदिनाथ ने दुखी प्रजा को किया सुखी – आदिनाथ भगवान ने सिर्फ जीने की ही कला नही सिखाई बल्कि उन्होने मरण के दुखो से वचने की भी कला सिखाई और समस्त प्रजा को आदिनाथ प्रभु ने 63 लाख पूर्व तक राज्य किया। उनकी आयु 84 लाख पूर्व थी। नीलाजंना नृत्य देखने पर उस के मरण से आदिनाथ कुमार को वैराग्य आ गया। उनकी आंखो के सामने नीलाजंना का मरण हो गया। जीवन को क्षण मंगुर समक कर तत्काल ही राज्य का भार पुत्रो को सौपकर वन में जाकर सन्यास धारण कर अपने हाथो से सिर मुछ,मुंह के वालो को उखाड कर फेक दिए और समस्त वस्त्रो,र्अभूषणो को उतारकर वीतरागी दिगम्बर दीक्षा लेकर 6 माह तक आहार पानी का त्याग कर खडें रहें। साथ ही 6 माह बाद वह आहार को निकले पर सारी पृथ्वी की जनता दिगम्बर जैन मुनि को आहार कैसे दिया जाता है इस विधि से वह अनभिस थी। क्योकि दिगम्बर मुनि किसी से कुछ मागंते नही है। इस कारण आदिनाथ भगवान के एक साल से कुछ दिन अधिक उपवास हो गए।
एक हजार वर्ष तपस्या के बाद प्राप्त हुआ कैवल्यज्ञान – एक वर्ष बाद जब बिहार करते हुए भगवान आदिनाथ हस्तानापुर नगर पहुचे तब वहा के राजा ने पड़गाहन किया। आइए स्वामी नमोस्तु आहार,जल शुद्ध है उन्हे उच्चासन पर बैठाया और पूजा, परिक्रमा लगाई। मन वचन काय शुद्ध है स्वामी आहार ग्रहण किजिए ऐसा बोलकर गन्ने का रस दिया। जो प्रभु ने एक साल के बाद सिर्फ तीन अजुंली लिया और पुनः वन की ओर जाकर ध्यान में लीन हो गए। भगवान को तपस्या करते हुए एक हजार वर्ष बाद उनको कैवल्यज्ञान प्राप्त हुआ। कैवल्यज्ञान प्राप्त होने पर फिर भूख,प्यास,सोना आदि दोष समाप्त हो जाते है। जब तक कैवल्यज्ञान नही होता तीर्थंकर मौन रहकर साधना करते है। कैवल्यज्ञान प्राप्त होने पर सगोसरण की रचना होती है और देवो के द्वारा सभी मनुष्य पशु-पक्षियो देवो को एक साथ आत्म कल्याण का उपदेश दिया जाता है।



