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बस्ती कप्तानगंज ज़कात इस्लाम का एक बुनियादी स्तंभ और सुव्यवस्थित सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत दान नहीं बल्कि सामूहिक संतुलन और न्याय की स्थापना है 

रिपोर्ट

शमसुलहक खान

आज तक 24X7 न्यूज़ ब्यूरो बस्ती

 

“ज़कात का न्यायपूर्ण वितरण”

 

बस्ती कप्तानगंज ज़कात इस्लाम का एक बुनियादी स्तंभ और सुव्यवस्थित सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत दान नहीं बल्कि सामूहिक संतुलन और न्याय की स्थापना है

। पवित्र क़ुरआन की सूरह तौबा (आयत 60) में ज़कात के हक़दारों को स्पष्ट रूप से निर्धारित कर दिया गया है: फ़क़ीर, मिस्कीन, आमिलीन-ए-ज़कात, मुअल्लफ़तुल क़ुलूब, फ़िर्रिक़ाब, ग़ारिमीन, फ़ी सबीलिल्लाह और इब्नुस्सबील। इन निर्धारित वर्गों के अतिरिक्त किसी अन्य मद में ज़कात देना शरई दृष्टि से उचित नहीं है। साथ ही फ़िक़्ही सिद्धांत के अनुसार ज़कात की अदायगी में “तमीलीक” अर्थात वास्तविक हक़दार को उसका मालिक बनाना अनिवार्य है।

हमारे समाज में दीऩी मदरसों को ज़कात का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है, क्योंकि वहाँ बड़ी संख्या में निर्धन और पात्र विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते हैं। बड़े और प्रसिद्ध मदरसे अपनी सेवाओं के कारण सम्माननीय हैं, किंतु छोटे और ग्रामीण क्षेत्रों के विश्वसनीय मदरसे और मकातिब अधिक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हैं। यही संस्थाएँ बुनियादी दीऩी शिक्षा, नाज़िरा क़ुरआन, हिफ़्ज़ और प्रारंभिक इस्लामी संस्कार प्रदान करती हैं। सीमित संसाधनों में विद्यार्थियों की आवास, भोजन और आवश्यकताओं की पूर्ति करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए ज़कात के वितरण में संतुलन आवश्यक है, ताकि बड़े संस्थानों के साथ छोटे, प्रमाणिक और जरूरतमंद मदरसों को भी उचित सहयोग मिल सके, बशर्ते कि ज़कात पात्र विद्यार्थियों की मिल्कियत में पहुँचे।

ज़कात की अदायगी में एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों को न भूले। इस्लामी शिक्षाओं में पड़ोसी के अधिकारों पर विशेष बल दिया गया है। यदि हमारे मोहल्ले या पड़ोस में कोई गरीब परिवार, विधवा, अनाथ, ऋणी या बीमार व्यक्ति हो तो उसे प्राथमिकता देना नैतिक और धार्मिक दायित्व है। कई बार हम दूरस्थ संस्थानों को बड़ी राशि भेज देते हैं, जबकि हमारे आसपास कोई ज़रूरतमंद सहायता की प्रतीक्षा में होता है। ज़कात की वास्तविक भावना समाज से गरीबी और अभाव को दूर कर पारिवारिक और सामाजिक स्थिरता स्थापित करना है।

अतः आवश्यक है कि ज़कात को क़ुरआन द्वारा निर्धारित मदों के अनुरूप विवेक, संतुलन और पारदर्शिता के साथ वितरित किया जाए। बड़े मदरसों की सेवाओं को स्वीकार करते हुए छोटे विश्वसनीय संस्थानों तथा अपने आसपास के पात्र व्यक्तियों की भी सहायता की जाए। इसी संतुलित दृष्टिकोण से अदा की गई ज़कात एक सशक्त, सम्मानजनक और सहानुभूतिपूर्ण समाज की आधारशिला बन सकती है।

✍️ मुफ्ती अब्बास अज़हरी मिस्बाही

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Author: aajtak24x7

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