ज़कात का मुकम्मल और आसान तरीका:

रिपोर्ट

शमसुलहक खान

आज तक 24X7 न्यूज़ ब्यूरो बस्ती

 

 

ज़कात का मुकम्मल और आसान तरीका

 

ज़कात इस्लाम के पाँच बुनियादी अरकान में से एक अहम रुक्न है। नमाज़ जिस्म की इबादत है और ज़कात माल की इबादत। यह महज़ ख़ैरात नहीं बल्कि एक फ़र्ज़-ए-क़तई है। जो शख़्स मालिक-ए-निसाब होने के बावजूद ज़कात अदा न करे, वह अल्लाह के यहाँ जवाबदेह होगा। सही हिसाब, क़मरी साल की पाबंदी और सही मुस्तहिक़ीन तक अदायगी — यही इस इबादत की रूह है।

ज़कात कब फ़र्ज़ होती है?

ज़कात हर मुसलमान, आक़िल और बालिग़ पर उस वक़्त फ़र्ज़ होती है जब:

वह मालिक-ए-निसाब हो

निसाब पर एक क़मरी साल (हौलान-ए-हौल) गुज़र जाए

माल हाजत-ए-अस्लिया से ज़्यादा हो

क़मरी साल का एतिबार होगा, शम्सी साल का नहीं।

निसाब की मात्रा क्या है?

चाँदी का निसाब

653.184 ग्राम ख़ालिस चाँदी

यानी तक़रीबन 52.5 तोला

सोने का निसाब

93.312 ग्राम सोना

यानी तक़रीबन 7.5 तोला

फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी में मौजूदा दौर में चाँदी के निसाब को मयार बनाना ज़्यादा मुफ़ीद माना गया है, ताकि ज़्यादा मुस्तहिक़ीन को फ़ायदा पहुँचे।

अमली हिदायत

अपने शहर (मुंबई, दिल्ली, लखनऊ, बेंगलुरु वगैरह) के सर्राफ़ा बाज़ार से 653.184 ग्राम चाँदी की मौजूदा क़ीमत मालूम करें। यही आपका निसाब होगा।

मसलन अगर यह क़ीमत 1,70,000 रुपये हो, तो जिसके पास ज़कात-योग्य माल मिलाकर इतनी या इससे ज़्यादा रकम हो, वह मालिक-ए-निसाब है।

हाजत-ए-अस्लिया क्या है?

वह बुनियादी ज़रूरतें जिनके बिना ज़िंदगी में सख़्त तंगी हो, जैसे:

रहने का मकान

पहनने के मुनासिब कपड़े

घरेलू ज़रूरी सामान

ज़ाती इस्तेमाल की गाड़ी

पेशेवर औज़ार (जैसे दर्ज़ी की मशीन, शिक्षक की किताबें)

एक साल का बुनियादी घरेलू ख़र्च

इन पर ज़कात नहीं है।

किन अमवाल पर ज़कात वाजिब है?

सोना और चाँदी (ज़ेवरात समेत)

नक़दी (घर या कारोबार में)

बैंक बैलेंस / फिक्स्ड डिपॉज़िट

क़ाबिल-ए-वसूल क़र्ज़

माल-ए-तिजारत (दुकान या स्टॉक)

फ़रोख़्त की नीयत से खरीदी गई ज़मीन या प्लॉट

शेयर्स, म्यूचुअल फ़ंड, गोल्ड ETF (मौजूदा मार्केट वैल्यू के मुताबिक)

किराए की जमा रकम (अगर साल भर बाकी रहे)

रहायशी मकान और ज़ाती गाड़ी पर ज़कात नहीं; अलबत्ता उनसे हासिल बचत या नक़दी पर ज़कात होगी।

ज़ेवरात के बारे में अहम वज़ाहत

औरतों के इस्तेमाल के ज़ेवरात पर भी ज़कात फ़र्ज़ है, चाहे मायके से मिले हों या शौहर ने दिए हों।

अगर ज़ेवर 22 या 18 कैरेट का हो, तब भी पूरे वज़न पर ज़कात दी जाएगी, क्योंकि ग़ालिब हिस्सा सोने का होता है, जैसा कि बहार-ए-शरीअत में बयान है।

ज़कात की दर और फ़ॉर्मूला

दर: 2.5% (ढाई फ़ीसद)

यानी हर 100 रुपये पर 2 रुपये 50 पैसे।

फ़ॉर्मूला:

कुल ज़कात-योग्य माल × 2.5 ÷ 100

मरहला-वार पेशेवर तरीक़ा-ए-हिसाब

तमाम ज़कात-योग्य अमवाल की फ़ेहरिस्त बनाएँ।

सोना, चाँदी, स्टॉक, शेयर्स वगैरह की मौजूदा मार्केट वैल्यू मालूम करें।

सबको जमा करें।

अगर कोई फ़ौरी वाजिब-उल-अदा क़र्ज़ हो तो उसे घटाएँ।

बाकी रकम का 2.5% निकालें।

साल के दौरान माल कम-ज्यादा होता रहे तो अस्ल एतिबार क़मरी साल के आग़ाज़ और इख़्तिताम का होगा।

तफ़्सीली अमली मिसालें

मिसाल A: मुलाज़िम पेशा शख़्स

बैंक बैलेंस: 3,00,000

नक़दी: 40,000

सोना (25 ग्राम): 1,50,000

कुल = 4,90,000

ज़कात = 4,90,000 × 2.5%

= 12,250 रुपये

मिसाल B: मुतवस्सित ताजिर (Retail Shop)

माल-ए-तिजारत: 8,00,000

कैश इन हैंड: 1,20,000

क़ाबिल-ए-वसूल क़र्ज़: 2,00,000

फ़ौरी वाजिब-उल-अदा क़र्ज़: 1,50,000

कुल असासा = 11,20,000

मिन्हा क़र्ज़ = 9,70,000

ज़कात = 9,70,000 × 2.5%

= 24,250 रुपये

मिसाल C: सिर्फ़ ज़ेवरात रखने वाली ख़ातून

80 ग्राम 22 कैरेट सोना

फ़र्ज़ करें मौजूदा क़ीमत: 5,20,000

ज़कात = 5,20,000 × 2.5%

= 13,000 रुपये

मिसाल D: किराए का मकान रखने वाला

एक मकान किराए पर दिया हुआ (फ़रोख़्त की नीयत नहीं)

साल भर में जमा किराया: 2,40,000

मकान पर ज़कात नहीं है।

अगर 2,40,000 रुपये साल के इख़्तिताम तक बाकी हों तो:

ज़कात = 2,40,000 × 2.5%

= 6,000 रुपये

मिसाल E: प्लॉट बराए तिजारत

फ़रोख़्त की नीयत से खरीदा गया प्लॉट

मौजूदा मार्केट वैल्यू: 15,00,000

ज़कात = 15,00,000 × 2.5%

= 37,500 रुपये

मिसाल F: सरमायाकार (Shares / Mutual Funds)

शेयर्स की मौजूदा वैल्यू: 4,00,000

म्यूचुअल फ़ंड: 2,00,000

नक़दी: 1,00,000

कुल = 7,00,000

ज़कात = 17,500 रुपये

ख़ुलासा-ए-हिसाब

कुल माल (रुपये)

ज़कात (2.5%)

1,00,000

2,500

5,00,000

12,500

10,00,000

25,000

25,00,000

62,500

50,00,000

1,25,000

1,00,00,000

2,50,000

अहम एहतियातें

साल क़मरी होगा।

निसाब पूरा होते ही साल शुरू माना जाएगा।

फ़रोख़्त की नीयत से ज़मीन हो तो मार्केट वैल्यू एतिबार होगी।

फ़ौरी वाजिब-उल-अदा क़र्ज़ घटाया जा सकता है।

ज़कात सिर्फ़ शरीअत के मुस्तहिक़ीन को दी जाए।

ज़कात महज़ हिसाब-किताब नहीं बल्कि ईमानी ज़िम्मेदारी है। यह माल को पाक करती है, समाज में इंसाफ़ पैदा करती है और फ़ुक़रा का हक़ अदा करती है। जो शख़्स पाबंदी के साथ सही हिसाब से ज़कात अदा करता है, वह अपने माल में बरकत और आख़िरत में सवाब जमा करता है।

✍️ मोहम्मद अब्बास अल-अज़हरी

ख़ादिमुत-तदरीस

दारुल उलूम अहले-सुन्नत फ़ैज़ुन्नबी

कप्तान गंज, बस्ती, यूपी

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