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गौरव के प्रतीक जीवाजी राव सिंधिया–ग्वालियर के महान शासक की अमर स्मृति है जीवाजी विश्वविद्यालय में स्थापित की गई प्रतिमा


ग्वालियर, मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक शहर महाराजा जीवाजी राव सिंधिया जैसे महान शासकों की कर्मभूमि रहा है। जीवाजी राव सिंधिया सिर्फ एक महाराजा ही नहीं बल्कि वे एक दूरदर्शी शासक भी थे। जिन्होंने न केवल ग्वालियर राज्य का सफलतापूर्वक शासन किया, बल्कि शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। शिक्षा के प्रसार के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनके योगदान और स्मृति को जीवंत रखने के लिए जीवाजी विश्वविद्यालय में प्रतिमा स्थापित की गई है। उनकी यह प्रतिमा न केवल ग्वालियर के लोगों के लिए बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। आइए, इस अविस्मरणीय पल पर याद करते हैं जीवाजी राव सिंधिया का शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान…
डॉ. केशव पाण्डेय
—– महाराजा जीवाजी राव सिंधिया को एक दूरदर्शी शासक के रूप में जाना जाता है। जीवाजी विश्वविद्यालय का 60 वर्ष पूर्व 11 दिसंबर 1964 को राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने शुभारंभ किया था। परम श्रद्धेय राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी का उदार योगदान रहा। यह विश्विद्यालय आज केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि यह ज्ञान का वह मंदिर है, जहाँ विचारों को गढ़ा जाता है, नवाचारों को आकार दिया जाता है। शिक्षा हमें यह सिखाती है कि हम केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज, देश और विश्व कल्याण के लिए भी उत्तरदायी हैं।
इसी सोच को साकार किया था शिक्षा को बढ़ावा देने वाले और आधुनिक ग्वालियर के शिल्पकार महाराजा जीवाजी राव सिंधिया ने, जिन्हें आज याद करने का अविस्मरणीय पल आया है।
15 दिसंबर 2024 का दिन जीवाजी राव सिंधिया की प्रतिमा के अनावरण के साथ एक नया इतिहास रचने जा रहा है। उनकी प्रतिमा ग्वालियर के इतिहास और संस्कृति से जुड़ी हुई है। यह आने वाली पीढ़ियों को उनके योगदान के बारे में बताएगी और छात्रों को उच्च लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करेगी साथ ही ग्वालियर की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बनेगी।
जीवाजी राव सिंधिया का योगदान केवल ग्वालियर तक ही सीमित नहीं था, बल्कि पूरे भारत के लिए महत्वपूर्ण था। इसलिए, उनकी प्रतिमा का राष्ट्रीय महत्व भी है। जीवाजी राव सिंधिया की प्रतिमा का जीवाजी विश्वविद्यालय में स्थापित होना एक ऐतिहासिक क्षण है।
क्योंकि जीवाजी राव सिंधिया का नाम भारतीय इतिहास में विशेष स्थान रखता है, वे केवल एक महान शासक ही नहीं, बल्कि शिक्षा, कला, संस्कृति और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में भी अपने अद्वितीय योगदान के लिए प्रसिद्ध थे।
उनका जीवन और कार्य ग्वालियर के विकास का प्रतीक बना। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में जो कार्य किए, वे आज भी ग्वालियर और प्रदेश सहित पूरे देश में याद किए जाते हैं।
महाराज जीवाजी राव सिंधिया लगातार दो कार्यकाल तक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रहे और विक्रम विश्वविद्यालय के पहले कुलाधिपति थे। वे शिक्षा के विकास के लिए सदैव तत्पर रहते थे। जीवाजी विश्वविद्यालय की आधारशिला इसी सोच का सकारात्मक परिणाम है।
उनकी इसी सोच को आगे बढ़ाया राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने। क्योंकि सिंधिया परिवार की सदैव यही सोच रही कि प्रदेश को आगे ले जाना है… देश को प्रगति और विकास के मार्ग पर प्रशस्त करना है …
अतीत की बात करें तो महाराजा जीवाजी राव सिंधिया ने ग्वालियर राज्य को एक आधुनिक राज्य बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने शिक्षा के प्रसार पर विशेष ध्यान दिया और ग्वालियर में कई स्कूल और कॉलेज स्थापित किए।
विद्या प्राप्यते तेजः- (शिक्षा आत्मविश्वास और गौरव लाती है) को ध्येय वाक्य मानने वाले जीवाजी विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के छह दशक में निरंतर प्रगति करते हुए आज राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यापन परिषद (एनएएसी) द्वारा ए डबल प्लस का दर्जा प्राप्त विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बन गया। जो आज भारत के प्रमुख विश्वविद्यालयों में से एक है। यह विश्वविद्यालय विभिन्न क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करता है। जीवाजी राव सिंधिया की प्रतिमा को इस विश्वविद्यालय में स्थापित करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विश्वविद्यालय उनके सपनों का प्रतीक है। और सिंधिया राजघराने का शिक्षा में योगदान अमूल्य है। जीवाजी विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद के सदस्य प्रदीप शर्मा का इस प्रतिमा की स्थापना में योगदान प्रशंसनीय और सराहनीय है। उनके अथक प्रयासों से ही यह संभव हो सका।
सिंधिया राजघराने ने प्रारंभिक शिक्षा के साथ ही तकनीकी शिक्षा पर खासा ध्यान दिया। माधव इंजीनियरिंग कॉलेज और सिंधिया कन्या विद्यालय की स्थापना भी महाराज जीवाजी राव सिंधिया के प्रयासों के तहत हुई थी। इसका उद्देश्य महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना था। इसकी नींव का पत्थर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा रखा गया था। जीवाजी राव सिंधिया लड़कियों की शिक्षा के पक्ष में थे। उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूलों की स्थापना की और उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके इस प्रयास से ग्वालियर राज्य में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला।
उज्जैन का विक्रम विश्वविद्यालय सिंधिया परिवार के गंगाजली कोष से उपहार के साथ अस्तित्व में आया। सम्राट अशोक तकनीकी महाविद्यालय विदिशा, डीएवी स्कूल ग्वालियर और भिंड, मुरैना और मंदसौर के शैक्षणिक संस्थान शामिल हैं।
जीवाजी राव सिंधिया को लेकर राधाकृष्णन का कहना था कि मैं जब ग्वालियर में उनसे मिला था, जब सर मनुभाई मेहता ग्वालियर राज्य के दीवान थे। महाराजा साहब तभी भी उच्चा शिक्ष के प्रसार में रुचि रखते थे, उन्होंने मुझसे ग्वालियर राज्य के लिए प्रस्तावित विश्वविद्यालय के बारे में अनेक सवाल किए थे। वे हमेशा युवा दिखते थे और उनका दिमाग भी उतना ही युवा था, कि वे प्रगतिशील, आधुनिकतावादी और अपने लोगों के कल्याण के लिए उत्सुक थे।
मध्य प्रदेश विधान सभा के तत्कालीन अध्यक्ष कुंजी लाल दुबे ने कहा था कि जीवाजी राव एक उत्कृष्ट प्रशासक और शिक्षा के महान प्रेमी थे, जिसके लिए उन्होंने भरपूर दान दिया।
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. कैलाश नाथ काटजू ने कहा था कि महाराज एक सच्चे देशभक्त थे और उन्होंने मध्य भारत और देश की बहुत सेवा की थी। वह एक उदार आात्मा थे और उन्होंने न केबल मध्य भारत क्षेत्र में बल्कि देश में अन्य स्थानों पर भी शिक्षा, कला और संस्कृति के प्रसार के लिए भारी दान दिया था।

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Author: aajtak24x7