आशुतोष चतुर्वेदी की रिपोर्ट (सिंगरौली ,देवसर )
सिंगरौली जिला, अपनी खदानों और औद्योगिक प्रगति के लिए प्रसिद्ध होने के साथ-साथ, कृषि के क्षेत्र में भी अपनी पहचान रखता है। लेकिन यहां के किसान अब एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां पारंपरिक खेती के तरीके पानी की कमी और बदलते मौसम की मार झेलने में असमर्थ हो रहे हैं। ऐसे में ज़रूरत है एक नई सोच और वैकल्पिक खेती के उन रास्तों की, जो न केवल कम पानी में समृद्धि ला सकें, बल्कि प्रकृति के साथ भी सामंजस्य बनाए रखें। कल्पना कीजिए, जहां पहले धान और गेहूं की फसलें अधिक पानी की मांग करती थीं, वहीं अब बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज कम पानी में भी लहलहा सकते हैं। ये अनाज न केवल पोषण से भरपूर हैं, बल्कि बाजार में इनकी मांग भी तेजी से बढ़ रही है। कम पानी में ज्यादा उत्पादन का सपना साकार करने के लिए ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों का सहारा लेना चाहिए। और जब सोलर पंप भी साथ हो, तो सिंचाई की लागत कम और सुविधा अधिक हो जाती है ,सोचिए, तिल, सूरजमुखी, अरहर और मूंग जैसे फसलें, जो कम पानी में भी भरपूर उत्पादन देती हैं। इन फसलों से किसानों को अच्छी आय तो होगी ही, साथ ही उनकी मेहनत का भी सही मूल्य मिलेगा। अगर किसान फसलों के बीच विविधता लाते हुए सब्जियों, मसालों और फलों की इंटरक्रॉपिंग करें, तो यह उनके खेत को और भी उपजाऊ बना सकता है। मसलन, अरहर के साथ मूंगफली या मक्का के साथ सब्जियों की खेती से खेत का हर हिस्सा फायदे में रहेगा सिंगरौली की मिट्टी में एग्रोफॉरेस्ट्री का भी खासा भविष्य छिपा है। आम, नीबू, आवला और अमरूद, पपीता जैसे पेड़ों के साथ सब्जियों की खेती करना न केवल लाभदायक है, बल्कि लंबे समय तक खेतों की उत्पादकता बनाए रखने में भी मददगार है। साथ ही, जैविक खेती की दिशा में कदम बढ़ाकर किसान अपने उत्पादों को विशेष पहचान दे सकते हैं। आज के समय में जैविक सब्जियों और मसालों की मांग हर बाजार में तेजी से बढ़ रही है सरकार की योजनाएं जैसे पीएम-कृषि सिंचाई योजना और नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर किसानों के लिए नए अवसरों का द्वार खोल रही हैं। कृषि विज्ञान केंद्रों और स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण देकर उन्हें और भी सशक्त बनाया जा सकता है। सिंगरौली के किसान अगर इस नई सोच को अपनाते हैं, तो वे न केवल अपनी आय में इजाफा करेंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी और सुरक्षित भविष्य भी बनाएंगे। बदलते समय के साथ कदम मिलाकर चलना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है। यह वैकल्पिक खेती न सिर्फ एक समाधान है, बल्कि एक नई शुरुआत है, जो सिंगरौली की मिट्टी में खुशहाली के बीज बो सकती है।



