



एक पत्थर जो अब तक प्रतीक्षा में था कि अपनी कठिन साधना और त्याग के बल से ओत प्रोत कोई ऐसा साधक जिसके छूने मात्र से उसका न सिर्फ कल्याण हो जाये बल्कि वह स्वयं दूसरों के लिये कल्याणकारी हो जाये, अब उसकी प्रतीक्षा पूर्ण हुई और जगत प्रसिद्ध जगत पूज्य निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी महाराज व निर्यापक मुनि श्री प्रसाद सागर जी महाराज ससंघ के कर कमलों से मंत्रोच्चार पूर्वक प्राण प्रतिष्ठा हुई और अगले ही पल वह पाषाण से भगवान हो गया।
बहोरीबंद की पावन धरा अब और महक उठेगी जब सारे भारत के भक्त उतुंग शांतिनाथ के दर्शनार्थ पहुचेंगे, बहोरीबंद का इतिहास बहुत पुराना और अतिशय युक्त हैं किंतु इतिहास में अब जो अमिट इबारत लिखी गई हैं यह पृथ्वी के अंत तक दिखाई देगी, विराजमान जिनबिम्बों की अनुपम छटा से ही मन में आनंद की अनुभूति आ जाती हैं फिर जब वह गगन चुम्बी जिनालय जिसकी कल्पना गुरु जी ने की हैं पूर्ण आकार में आएगा तो वह नजारा किसी अकर्तिम जिनालय से कम न होगा।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी महाराज विश्व के एक मात्र ऐसे साधु हैं जिनके कर कमलों से एक दो नही बल्कि हजारों तीर्थ जीर्णोद्धार होकर जैन धर्म का मान और गौरव बड़ा रहें हैं इसमें कोई दो राय नही कि बहोरीबंद का यह जिनालय जब अपने पूर्ण यौवन पर होगा तो देवतागण भी आकर प्रशंसा में गीत गाएंगे।
करोड़ो लोगो के दिल में राज करने वाले निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी महाराज जब तक इस धरती पर विचरण कर रहें हैं वे जहां जहां कदम रखते जाएंगे नए नए तीर्थो का उदय होता जाएगा, शायद ऐसे ही सन्त की प्रशंसा में किसी ने लिखा हैं जहां जहां चरण पड़े सन्तन के- वे सब तीरथ हो जाते हैं।
पूज्य गुरुदेव के चरणों मे सत सत नमन
उनकी छत्रछाया बनी रहे


