*नगर पालिका बड़वाह की मनमानी पर हाईकोर्ट का चला डंडा*
*केशबुक छुपाने की कीमत अब चुकानी पड़ेगी : भ्रष्टाचार की गठरी खुलेगी दस्तावेज़ देने के आदेश*
*मिश्रीलाल कोहरे*
ओंकारेश्वर /बड़वाह
नगर पालिका बड़वाह की केशबुक को “गोपनीय खजाना” बनाकर बैठना अधिकारियों को महंगा पड़ता दिख रहा है । नियमों के तहत मांगी गई जानकारी न देने पर प्रभारी मुख्य नगर पालिका अधिकारी कुलदीप किंशुक (मूल पद राजस्व उप निरीक्षक) मनमानी पर अड़े रहे, तो अंतः मामला मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय तक जा पहुंचा।
तीन सप्ताह में देवें केशबुक व प्रोसिडिंग की कॉपी
याचिकाकर्ता नरसिंह सुरागे की याचिका पर हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि तीन सप्ताह में श्री सुरागे को 6 वर्ष की केशबुक की प्रतिलिपि प्रदान की जावे । इसी के साथ वर्तमान परिषद कार्यकाल की अजेंडा, प्रोसिडिंग, अध्यक्ष राकेश गुप्ता के अध्यक्ष परिषद के अजेंडा व प्रोसिडिंग की कॉपी देने का आदेश कुलदीप किंशुक को दिया गया है । यह आदेश न्यायमूर्ति श्री प्रणय वर्मा के न्यायालय ने जारी किया है । आदेशानुसार श्री सुरागे ने आदेश की प्रति भौतिक रूप से तथा ईमेल द्वारा नगर पालिका को पहुंचा दी है ।
केशबुक देने में डर क्यों रही नगर पालिका बड़वाह
9 सितम्बर 2005 को बड़वाह के 6 पार्षदों द्वारा नगर पालिका बड़वाह से केश बुक, परिषद की प्रोसिडिंग तथा अध्यक्ष परिषद की प्रोसिडिंग की प्रतिलिपि की मांग की गई थी । जिसे प्रभारी मुख्य नगर पालिका अधिकारी कुलदीप किंशुक (मूल पद राजस्व उप निरीक्षक) द्वारा मनमानी करते हुए प्रदाय नहीं की गई । दस्तावेजों की यह मांग नगर पालिका अधिनियम के अंतर्गत धारा 355 (1) “अभिलेखों की प्रतिलिपियॉं प्राप्त करने” के अंतर्गत की गई थी । कुलदीप किंशुक द्वारा दस्तावेज देने की बजाय सन 1962 के राजपत्र की प्रतिलिपि पार्षदों को ढूंढने का पत्र जारी किया गया था । इस विषय को पार्षदों ने जिला कलेक्टर और आयुक्त नगरीय विकास के समक्ष भी उठाया । लेकिन केशबुक, प्रोसिडिंग इत्यादी पार्षदों को नहीं मिली ।
*प्रशासन नहीं माना तो ली कोर्ट की शरण **
जनप्रतिनिधियों के तिरस्कार के खिलाफ कुलदीप किंशुक के खिलाफ वार्ड क्रमांक 4 के पार्षद नरसिह सुरागे ने हाईकोर्ट की शरण ली 2 दिसम्बर 2025 को सिनियर एडव्होकेट श्री ए के सेठी द्वारा प्रस्तुत याचिका पर 9 दिसम्बर को बहस हुई जिसका निर्णय न्यायमूर्ति श्री प्रणय वर्मा द्वारा दिनांक 12 दिसम्बर 2025 को जारी किया ।
खरगोन कलेक्टर की टी एल बैठक को भी ठेंगा बताया कुलदीप किंशुक ने
पार्षदो ने जानकारी न मिलने से परेशान होकर खरगोन कलेक्टर, खरगोन संयुक्त संचालक, नगरीय प्रशासन इंदौर संभाग आयुक्त, नगरीय प्रशासन भोपाल को भी लिखित रूप से शिकायत पत्र भेजे। इसके बावजूद किसी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई और न ही नगर पालिका को जानकारी देने के निर्देशों का पालन कराया गया। कलेक्टर सुश्री भव्या मित्तल द्वारा पार्षदों के आवेदन को टी एल बैठक में मार्क किया गया । इसके बावजूद बड़वाह नगर पालिका ने पार्षदों को वांछित जानकारी नहीं दी ।
त्वरित न्याय मिलने पर नरसिह सुरागे ने कहा कि यह निर्णय भ्रष्ट अधिकारियों पर शिकंजा सिद्ध होगा ।
क्या है नियम –
नगर पालिका अधिनियम के अंतर्गत धारा 355 (1) “अभिलेखों की प्रतिलिपियॉं प्राप्त करने” के अंतर्गत की गई थी । यह नियम नगर पालिका विधि संग्रह में दर्ज है । वर्ष 1962 से प्रचलित इस नियम को मानने से कुलदीप किंशुक ने इंकार कर दिया था। दागी अफसर कुलदीप किंशुक ने दस्तावेज देने की बजाय सन 1962 के राजपत्र की प्रतिलिपि पार्षदों को ढूंढने का पत्र जारी किया गया था । नियम पूरी तरह स्पष्ट हैं निर्धारित शुल्क लेकर अभिलेख उपलब्ध कराना अनिवार्य है, इसमें किसी प्रकार की मनमानी की कोई गुंजाइश नहीं है। इसके बावजूद नगर पालिका के संबंधित अधिकारियों ने महीनों तक न तो कोई आदेश पारित किया और न ही जानकारी दी। हाई कोर्ट ने उपरोक्त नियम को मान्यता देते हुए नगर पालिका को केशबुक इत्यादी देने का महज एक सप्ताह में ही निर्णय दे दिया ।
*बड़वाह नगर पालिका की खुली मनमानी*
यह भी उल्लेनीय है कि राज्य सूचना आयोग के आदेश द्वारा बड़वाह नगर पालिका के अधिकारी को जानकारी नहीं देने पर 25000 रूपये का दण्ड भी लगाया है । इसके बावजूद नगर पालिका बड़वाह से सुचना के अधिकार के तहत जानकारी नहीं देना प्रचलन में है । यह रवैया सूचना आयोग के आदेश की अवहेलना है।
*अब नहीं चलेगी मनमानी*
अब “फाइल दबाने”, “आदेशों की अनदेखी” और टालमटोल” का खेल खत्म होता दिख रहा है। यह मामला सिर्फ एक आवेदक का नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार, प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की असली परीक्षा बन चुका है। हाईकोर्ट और सूचना आयोग दोनों के हस्तक्षेप ने साफ कर दिया है सरकारी रिकॉर्ड जनता की संपत्ति हैं अफसरों की निजी तिजोरी नहीं है।



