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विकास की राख में सिसकती रेणुका, कब जागेगा तंत्र?

लोकेशन/ सोनभद्र उत्तर प्रदेश

रिपोर्ट/ कन्हैयालाल केशरी

 

विकास की राख में सिसकती रेणुका, कब जागेगा तंत्र?

ओबरा (सोनभद्र)। औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी अब भारी पड़ने लगी है। ओबरा क्षेत्र की रेणुका नदी आज गंभीर प्रदूषण संकट से जूझ रही है। तापीय विद्युत परियोजना से निकलने वाली फ्लाई ऐश (राख) को लंबे समय से सीधे नदी में बहाया जा रहा है, जिससे न केवल पर्यावरणीय नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं, बल्कि पूरी पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा मंडरा रहा है।

हाल ही में ‘सोन चेतना सामाजिक संगठन’ द्वारा तहसील दिवस में की गई शिकायत के बाद प्रशासनिक टीम ने मौके का निरीक्षण किया। अधिकारियों का मौके पर पहुंचना सकारात्मक कदम जरूर है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या कार्रवाई केवल निरीक्षण तक सीमित रहेगी या दोषियों पर ठोस कार्रवाई भी होगी।

नियमों का उल्लंघन, व्यवस्था मौन

पर्यावरण संरक्षण से जुड़े नियम और ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ नीति स्पष्ट रूप से कहती है कि बिना उपचार के किसी भी औद्योगिक अपशिष्ट को जल स्रोतों में नहीं छोड़ा जा सकता। इसके बावजूद ओबरा में इन नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है। निरीक्षण के दौरान प्रशासनिक टीम—जिसमें एसडीएम, तहसीलदार व लेखपाल शामिल थे—ने नदी की दयनीय स्थिति को प्रत्यक्ष देखा, लेकिन अब तक प्रभावी कार्रवाई का अभाव सवाल खड़े कर रहा है।

बंजर होती जमीन, संकट में जीवन

प्रदूषण का सबसे बड़ा असर स्थानीय किसानों और ग्रामीणों पर पड़ रहा है। राख युक्त पानी के कारण खेतों की उर्वरता घटती जा रही है, जिससे खेती प्रभावित हो रही है। वहीं दूषित जल के कारण मवेशियों और जलीय जीवों की मौतें भी चिंता का विषय बन गई हैं। यह स्थिति न केवल पर्यावरण बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बनती जा रही है।

जवाबदेही तय करने की जरूरत

प्रशासन ने संबंधित फर्मों की जानकारी जुटानी शुरू कर दी है, लेकिन अब आवश्यकता सख्त कार्रवाई और जवाबदेही तय करने की है। यदि समय रहते इस समस्या पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में क्षेत्र को पीने के पानी और स्वच्छ पर्यावरण के गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।

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Author: aajtak24x7