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संघ कार्यकर्ता के टपरे पर कार्रवाई, मांस-मटन की दुकानों पर कथित नरमी?

संघ कार्यकर्ता के टपरे पर कार्रवाई, मांस-मटन की दुकानों पर कथित नरमी?

कैंट बोर्ड और रक्षा संपदा विभाग की कार्रवाई पर उठे सवाल, स्थानीय विधायक की भूमिका पर भी सवालिया निशान

 

न्यूज़ रिपोर्टर मोहित संघी

 

जबलपुर। कैंट क्षेत्र में अतिक्रमण और अवैध गतिविधियों के खिलाफ प्रशासन की कार्रवाई को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जबलपुर आयुध जिला अंतर्गत शिवाजी नगर कार्यवाह जागेश राव के टेंट हाउस के टपरे को 3 सितंबर को अतिक्रमण बताते हुए रक्षा संपदा विभाग, मिलिट्री क्यूआरटी और कैंट बोर्ड की संयुक्त कार्रवाई में हटाए जाने के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं।

 

आरोप है कि कार्रवाई के दौरान पुलिस प्रशासन की मौजूदगी, तहसीलदार और एसडीएम की भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती या कोई अप्रिय घटना होती तो इसकी जवाबदारी किसकी होती?

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अतिक्रमण हटाने के नियम सभी के लिए समान हैं या कार्रवाई चुनिंदा लोगों तक सीमित है?

 

स्थानीय लोगों और संघ से जुड़े समर्थकों का आरोप है कि एक ओर संघ के दायित्ववान कार्यकर्ता के छोटे से टपरे पर तत्काल कार्रवाई की गई, वहीं दूसरी ओर कैंट क्षेत्र की मुख्य सड़कों पर कथित रूप से लंबे समय से संचालित मांस-मटन और बिरयानी की दुकानों तथा अन्य निर्माणों को लेकर उतनी तत्परता नजर नहीं आती।

 

‘एक जगह बुलडोजर, दूसरी जगह खामोशी क्यों?’

 

सदर मेन रोड, गोलछा पेट्रोल पंप के समीप एक होटल/व्यावसायिक प्रतिष्ठान के संबंध में भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि वहां रक्षा संपदा की भूमि पर अतिक्रमण बढ़ाकर व्यवसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं तथा मांस-मटन की बिक्री खुलेआम हो रही है।

 

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि संबंधित भूमि सरकारी अथवा रक्षा संपदा की है और वहां नियमों के विरुद्ध निर्माण या व्यवसाय संचालित हो रहा है तो प्रशासन को उसकी भी निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई करनी चाहिए।

 

सवाल सीधा है—

यदि अतिक्रमण गलत है तो फिर कार्रवाई व्यक्ति देखकर क्यों?

और यदि नियम सभी के लिए समान हैं तो फिर हर अवैध निर्माण पर एक समान कार्रवाई कब होगी?

 

गोराबाजार शराब दुकान मामले से तुलना

 

गोराबाजार में कथित अवैध एवं अतिक्रमणयुक्त शराब दुकान को लेकर भी क्षेत्र में पहले विरोध सामने आ चुका है। आरोप है कि संबंधित दुकान को लेकर कार्रवाई की प्रक्रिया के बावजूद उसे पर्याप्त समय मिला और मामला न्यायालय तक पहुंच गया।

 

यही कारण है कि अब लोग तुलना कर रहे हैं कि शराब दुकान के मामले में प्रशासनिक प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों चली और संघ कार्यकर्ता के टपरे के मामले में कार्रवाई इतनी तेजी से कैसे हो गई?

 

यदि दोनों मामलों में नियम समान हैं तो प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि कार्रवाई की कसौटी क्या है।

 

विधायक और सांसद की भूमिका पर भी सवाल

 

इस पूरे मामले में क्षेत्रीय विधायक और सांसद की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जनप्रतिनिधि वास्तव में जनता और कार्यकर्ताओं की समस्याओं को गंभीरता से सुनते हैं तो उन्हें प्रशासन से निष्पक्ष कार्रवाई और समान नियम लागू कराने की मांग करनी चाहिए।

 

सवाल यह भी है कि क्या जनप्रतिनिधियों की प्रशासनिक अधिकारियों पर कोई सुनवाई नहीं है या फिर वे स्वयं जनता की शिकायतों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं ले रहे?

 

‘कैंट बोर्ड या मांस-मटन बिक्री बोर्ड?’

 

कैंट क्षेत्र में नियमों के उल्लंघन को लेकर उठ रही शिकायतों ने कैंट बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि मांस-मटन की बिक्री, अतिक्रमण, यातायात अवरोध या अन्य गतिविधियां नियमों के विरुद्ध हैं तो उनके खिलाफ भी बिना भेदभाव कार्रवाई होनी चाहिए।

 

साथ ही, धार्मिक भावनाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में संबंधित विभागों को नियमों के अनुसार जांच करनी चाहिए।

 

‘संघ कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं तो आम नागरिक का क्या?’

 

इस घटनाक्रम ने राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में भी बहस छेड़ दी है। समर्थकों का कहना है कि यदि सत्ता पक्ष से जुड़े विचारधारा के संगठन के एक सामान्य कार्यकर्ता को भी अपनी बात रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो आम नागरिक की स्थिति क्या होगी?

 

वहीं प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह पारदर्शिता के साथ यह स्पष्ट करे कि 3 सितंबर की कार्रवाई किस आदेश, किस नियम और किस प्रक्रिया के तहत की गई तथा कैंट क्षेत्र में अन्य कथित अतिक्रमणों पर क्या कार्रवाई की गई है।

 

अब जनता मांग रही जवाब

 

कैंट क्षेत्र में उठते सवालों के बीच अब लोगों की मांग है कि—

 

• सभी अतिक्रमणों का निष्पक्ष सर्वे कराया जाए।

• सरकारी/रक्षा भूमि पर हुए निर्माण की जांच हो।

• मांस-मटन एवं अन्य व्यावसायिक गतिविधियों की वैधता जांची जाए।

• कार्रवाई में किसी प्रकार का भेदभाव न हो।

• 3 सितंबर की कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए।

• यदि किसी अधिकारी ने नियमों का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई हो।

 

कैंट क्षेत्र की जनता अब यही सवाल पूछ रही है—

 

“कानून सबके लिए बराबर है तो कार्रवाई भी सब पर बराबर कब होगी?”

 

और इसी के साथ विरोध के स्वर भी तेज हो रहे हैं—

 

“टिकट बदलो, नहीं तो विधायक बदलो!”

 

फिलहाल पूरे मामले में संबंधित विभागों और जनप्रतिनिधियों का पक्ष सामने आना बाकी है। उनके पक्ष के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

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Author: aajtak24x7

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