23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जैन समाज ने धूमधाम से मनाया मोक्ष कल्याणक महोत्सव


जैन बडें मंदिर,पचखनी मंदिर में शांति धारा,अभिषेक के साथ भगवान को चढाया गया निर्वाण लाडू
चांदी के विमान पर विराजमान होकर नगर भ्रमण पर निकले भगवान पार्श्वनाथ

सिरोंज। जैन समाज के 23वे तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव बडें ही धूमधाम से मनाया गया। दिगम्बर जैन बडें मंदिर,दिगम्बर जैन पचखनी मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ का विशेष अभिषेक व शांतिधारा की गई। साथ ही भगवान पार्श्वनाथ का विधान व पूजा अर्चना के साथ निर्वाण लाडू चढाया गया। तो वही जैन समाज की माहिलाएं निर्वाण लाडू अपने अपने तरीके से बनाकर लाई। इसके पश्चात् चांदी के रथ पर भगवान पार्श्वनाथ को विराजमान कर नगर के मुख्य मार्गो से जैन समाज द्वारा चल समारोह निकाला गया। जिसमें जैन समाज की महिलाए,युवा वर्ग,बुजुर्गो के साथ दिव्य देशना महिला मण्डल की महिलाएं अपने डेस कोड में चलकर चल समारोह की शोभा बडा रही थी। दिव्य देशना महिला मण्डल की अध्यक्ष श्रीमति रानी जैन बगरौदा ने मोक्ष सप्तमी के रूप में तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के बारे जानकारी देते हुए बताया कि भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर है और उनका काल लगभग 872-772 ईसा पूर्व माना जाता है। वे तीर्थंकर नेमिनाथ से 84000 वर्ष बाद तथा भगवान महावीर से 273 वर्ष पहले हुए थें। जैन ग्रंथो के अनुसार पार्श्वनाथ 100 वर्ष तक जीवित रहें। उनका जन्म वाराणसी (काशी) में हुआ था, और उन्होंने 30 वर्ष की आयु में संन्यास ले लिया था. 84 दिन की कठोर तपस्या के बाद, उन्होंने 84वें दिन कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया। लगभग 70 वर्षों तक धर्मोपदेश करने के बाद, वे शाश्वत तीर्थ सम्मेद शिखर सम्मेदाचल पर्वत पर 772 ईसा पूर्व में निर्वाण को प्राप्त हुए। जिन मंदिरों में भगवान पार्श्वनाथ के जिन बिम्ब के ऊपर प्रायः फण फैलाया हुआ। सर्प दृष्टिगोचर होता है, जो उनपर हुए घोर उपसर्ग का प्रतीक है। जैन धर्म के चौबीस तीर्थकर में से अवसपणि काल में घोर उपसर्ग को सहन करने वाले तेइसवे तीर्थकर श्री पार्श्वनाथ स्वामि कहे गये है। वर्तमान काल में सबसे अधिक जिनबिम्ब तथा जिन मन्दिर भगवान पार्श्वनाथ के दिखाई देते हैं। पार्श्वनाथ भगवान को संकट मोचक पार्श्व भी कहा जाता है। इनके निर्वाणोत्सव को मोक्ष सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। वही उन्होने बताया कि भगवान पार्श्वनाथ पर कमठ नामक जीव द्वारा घोर उपसर्ग किए जाने बाबत शास्त्रों में लिखा है। राजा अरविन्द के दो मंत्री कमठ और मरुभूति थे। कमठ बड़ा भाई अत्यन्त दुष्ट प्रकृति का,दुव्यवहारी था, जबकि छोटा भाई मरुभूति सज्जन और सद्व्यवहारी था। एक दिन मरुभूति को राज्य कार्य से नगर से बाहर जाना पढ़ा तब कमठ ने छोटे भाई की पत्नी के साथ दुव्यवहार करना चाहा। जब राजा को यह बात ज्ञात हुई तो उसने कमठ को देश निकाला दे दिया। अतः वह तापसी बनकर जंगल में रहने लगा और कुतप करने लगा, मरुभूति के लौट आने पर, सब घटना ज्ञात होने पर भातृ-प्रेम के कारण वह कमठ के पास गया और पैर पड़ते हुए क्षमा याचना पूर्वक घर चलने की प्रार्थना अत्यधिक क्रोधित हो उस पर शिला पटक दी,जिससे मरुभूति दुध्यान पूर्वक मरण कर कई भव से गुजरने करने लगा। तब कमठ ने और के उपरांत सोलहकारण भावनाओं का चिंतन कर तीर्थकर प्रकृति का बंध किया। तब सिंह के द्वारा भक्षण किये जाने पर समाधि पूर्वक मरण कर आनत स्वर्ग में इन्द्र हुआ।

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Author: aajtak24x7

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