दरवाज़े के बाहर लिखा है — “परामर्श शुल्क ₹1000”
एक बार डॉक्टर को दिखाने के लिए, सिर्फ 7 दिनों तक मान्य।
एक गरीब मज़दूर के लिए यह सिर्फ़ फीस नहीं, बल्कि पूरे हफ्ते की रोटी का हिसाब है।
जिस देश में किसान दिनभर धूप में जलकर 300-400 रुपये कमाता हो,
जहाँ मज़दूर की कमर ईंट ढोते-ढोते टूट जाती हो,
वहाँ एक बीमार इंसान से 5 मिनट की बातचीत के ₹1000 लेना…
क्या सच में “सेवा” कहलाता है?
डॉक्टर को भगवान कहा गया था।
लेकिन आज मेडिकल सिस्टम के कई हिस्सों में “सेवा” की जगह “व्यापार” बैठ चुका है।
OPD फीस आसमान पर,
टेस्ट कमीशन पर,
और ऊपर से महंगी “मोनोपोली” दवाइयाँ —
जिन्हें गरीब खरीदते समय अपनी जेब नहीं, अपनी उम्मीदें खाली करता है। एक मरीज से ₹1000 , दिन भर में 250 से 300 मरीज आप हिसाब लगा सकते हैं।
औसत मरीज 200× ₹1000 = ₹2,00,000 पर डे का है।
गरीब आदमी अस्पताल इलाज कराने नहीं, डरते हुए जाता है।
उसे बीमारी से कम, बिल से ज्यादा डर लगता है।
वो सोचता है —
“अगर डॉक्टर को दिखाया, तो बच्चों की फीस कैसे भरूंगा?”
“दवा खरीदी, तो घर का राशन कैसे आएगा?”
सब डॉक्टर ऐसे नहीं होते।
आज भी कई ईमानदार डॉक्टर हैं जो रात-रात भर मरीज बचाते हैं, कम फीस लेते हैं, इंसानियत निभाते हैं।
लेकिन जो लोग बीमारी को बिजनेस बना चुके हैं,
जो हर मरीज में सिर्फ़ “कमाई” देखते हैं —
उन्होंने पूरे पेशे की छवि को चोट पहुंचाई है।
स्वास्थ्य कोई लग्ज़री नहीं है।
इलाज अमीरों का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए।
अगर एक गरीब इंसान इलाज के डर से अस्पताल जाने से कतराने लगे,
तो समझिए समाज कहीं न कहीं संवेदनहीन हो चुका है।
ज़रूरत है ऐसे सिस्टम की —
जहाँ डॉक्टर सम्मान से कमाएँ,
लेकिन गरीब इलाज के लिए बिकने पर मजबूर न हो।
जहाँ दवा इंसान बचाने के लिए हो,
न कि कंपनियों का मुनाफा बढ़ाने के लिए।
क्योंकि जब इलाज बाज़ार बन जाता है,
तब सबसे पहले गरीब की साँसें हारती हैं।
*Raj Rathore*



