संदीप – पाटीदार राणा ,ख़रग़ोंन
किसानों के साथ बड़ा छल! ससलिया तालाब का पानी शिप्रा में छोड़ा, हजारों एकड़ फसलें सूखने की कगार प
महेश्वर/खरगोन। एक तरफ प्रदेश सरकार पूरे उत्साह के साथ “किसान कल्याण वर्ष” मना रही है और किसानों की आय बढ़ाने तथा खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्र के किसानों को सिंचाई के पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ससलिया तालाब का पानी शिप्रा नदी में छोड़े जाने से हजारों किसानों की गर्मी की फसलें संकट में आ गई हैं।
क्षेत्र के किसान मुख्य रूप से नहर के पानी पर निर्भर हैं। किसानों ने भारी लागत लगाकर अपनी फसलें बोई हैं, लेकिन पिछले मात्र 15 दिनों में नहर का पानी दो बार बंद कर दिया गया। नतीजतन खेतों में खड़ी फसलें सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं और किसानों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।
किसानों का कहना है कि फसल के महत्वपूर्ण समय पर पानी नहीं मिलने से उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। यदि जल्द ही नियमित सिंचाई व्यवस्था बहाल नहीं की गई तो हजारों एकड़ भूमि की फसल प्रभावित होगी और किसानों को लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। पहले से ही बढ़ती लागत, महंगे बीज, खाद और कृषि कार्यों के खर्च से जूझ रहे किसानों के सामने अब सिंचाई का नया संकट खड़ा हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रदेश में “किसान कल्याण वर्ष” मनाया जा रहा है, तब किसानों की जीवनरेखा माने जाने वाले सिंचाई जल को खेतों तक पहुंचाने के बजाय अन्यत्र क्यों भेजा जा रहा है? किसानों का आरोप है कि उनकी फसलों की कीमत पर लिए जा रहे निर्णय कृषि हितों के विपरीत हैं।
किसानों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि ससलिया तालाब के पानी को प्राथमिकता के आधार पर सिंचाई के लिए उपलब्ध कराया जाए तथा नहरों में नियमित जल प्रवाह सुनिश्चित किया जाए। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र उचित कदम नहीं उठाए गए तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होंगे।
किसानों का कहना है कि सरकार के किसान हितैषी दावे तभी सार्थक होंगे जब खेतों तक समय पर पानी पहुंचे और किसानों की मेहनत को बचाया जा सके। अन्यथा “किसान कल्याण वर्ष” केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाएगा।